Thursday, October 2, 2014

जय गाँधी जय शास्त्री जी

गाँधी जी तथा लालबहादुर शास्त्री जी को विनम्र श्रद्धांजलि उनके संस्मरणों के माध्यम से
गाँधी जी जब अफ्रीका में थे, उस समय भारतीयों से भरा एक पानी का जहाज अफ्रीकी समुद्र तट पर खड़ा हुआ था और वहां का राजा, जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, ने भारतीयों को अफ्रीकी धरती पर उतरने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उनके पास वैध कागजात और अनुमति पत्र नहीं थे। इस प्रकार जहाज में पड़े रहने से भारतीयों में डायरिया तथा संक्रामक बीमारियाँ फैलने लगीं। इतनी दूर आ जाने के बाद वे वापस भारत भी नहीं जा सकते थे। ऐसे में गांधी जी ने उन मासूम भारतीयों की सहायता करने के उद्देश्य से राजा से मिलने का निर्णय लिया। लोगों ने उन्हें मना करते हुए आगाह किया कि नाराज़ होने पर राजा आगंतुक को अपने दो पालतू शेरों के आगे फिंकवा देता है, किन्तु गाँधी जी ने उनकी चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए राजा से मिलने का निर्णय किया। राजा के महल में पहुंचकर जब वे राजा से मिले तो उनकी दृढ़ता तथा निःस्वार्थ भावना देखकर क्रूर और अन्यायी राजा भी पिघल गया और उसने जहाज पर पड़े हुए भारतीयों को प्रवेश की अनुमति दे दी तथा बीमारों के उपचार की व्यवस्था की।

एक बार लालबहादुर शास्त्री जी से एक ग्रामीण मिलने आया और उसने शिकायत की कि उसके बेटे को पुलिस में नौकरी नहीं मिल पा रही है, यदि प्रधानमन्त्री के रूप में आप उसकी सिफारिश कर देंगे तो उसे यह नौकरी मिल सकती है।जब शास्त्री जी ने उसके पुत्र को पुलिस में नौकरी न मिल पाने की वजह पूछी तो उसने बताया कि कद कम होने के कारण उसे इस नौकरी के योग्य नहीं समझा गया। इस पर शास्त्री जी ने उसे समझाया कि पुलिस में एक निश्चित कद काठी के व्यक्ति को ही नौकरी मिल सकती है तो उस ग्रामीण ने उनसे मासूमियत के साथ सवाल किया कि शास्त्री जी आपकी भी तो ऊंचाई कम है फिर आप कैसे प्रधानमन्त्री बन गए। इसका बुरा न मानते हुए शास्त्री जी ने उसे बड़े प्यार से समझाया कि तुम्हारा बेटा मेरी तरह प्रधानमन्त्री तो बन सकता है लेकिन पुलिस में भरती नहीं हो सकता।
इन दोनों महापुरुषों को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन।

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